माइक्रो विंडमिल : सेलफोन
चार्ज करने के लिए चावल के
दाने से भी छोटी पवनचक्की
अमेरिका में रह रही भारतीय मूल
की वैज्ञानिक डॉ. स्मिता राव
का आविष्कार अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में मील
का पत्थर है. डॉ. ऱाव ने अपने
ताइवानी शिक्षक प्रोफेसर जे. सी. चिआओ के
सहयोग से ऐसी पवनचक्की तैयार की है
जो चावल के एक दाने के दसवें हिस्से के बराबर
छोटी है - सूक्ष्म पवनचक्की (Micro
Windmill). माइक्रो इलेक्ट्रो मेकैनिकल
सिस्टम्स (MEMS) बनानेवाली ताइवान
की कंपनी विनमेम्स (WinMEMS
Technologies Co.) को यह माइक्रो विंडमिल
टेक्नोलॉजी इतनी पसंद आयी कि उसने शुरुआत
से ही इसके व्यावसायिक उपयोग का करार कर
रखा है. कंपनी अपनी वेबसाइट पर इसे प्रदर्शित
भी कर रही है.
अभी इस पवनचक्की का इस्तेमाल सेलफोन
की बैटरी चार्ज करने के लिए होना है. लेकिन
जाहिर है कि इस दिशा में और
प्रगति होगी तो इन सूक्ष्म पवनचक्कियों से
भविष्य में बैटरीचालित अन्य घरेलू इलेक्ट्रॉनिक
उपकरण भी रिचार्ज किए जा सकेंगे. खुद डॉ.
स्मिता राव भी मानती हैं कि सूक्ष्म
पवनचक्कियों के इस्तेमाल की संभावनाओं
की सतह को अभी उन्होंने खरोंचा भर है.
लेकिन यह खरोंच इतनी गहरी है कि ऊर्जा के
क्षेत्र में अनंत संभावनाओं के अनगिनत द्वार
खुलते नजर आ रहे हैं.
अभी तक पवनचक्की का विकास सिर्फ
विशालता की दिशा में होता आया है.
पवनचक्की की बेहतरी का मतलब उसे विशालतर
बनाना रहा है. दैत्याकार पवनचक्कियों के
लिए खुली जगह तो चाहिए ही, इनके ब्लेड से
टकराकर हर साल हजारों परिंदे अपनी जान
गंवा देते हैं. डॉ. स्मिता राव ने इन्हें
बौना बनाकर हमारे घर के अंदर,
बल्कि हमारी जेब में, हमारी आस्तीन में
ला दिया. बौना भी ऐसा बनाया कि चावल
के एक दाने में दस पवनचक्कियां समा सकती हैं.
पवनचक्की के विकास के हजारों साल के
इतिहास में जिस डिजाइन की किसी ने
कल्पना भी नहीं की थी, स्मिता ने उसे कर
दिखाया. ऐसी पवनचक्कियां पोर्टेबल व
सस्ती तो होंगी ही, इनसे किसी जीव
को हानि भी नहीं पहुंचेगी. सबसे बड़ी बात है
कि ऊर्जा के लिए कोयले और पेट्रोल पर
हमारी निर्भरता खत्म हो जाएगी. अभी तक
व़ैकल्पिक ऊर्जा की बात
होती थी तो हमारी निगाहें सबसे अधिक सौर
ऊर्जा को निहारती थीं. माइक्रो विंडमिल
डिजाइन ने पवन
ऊर्जा को भी बराबरी या कहीं उससे
भी अधिक संभावना वाला स्रोत
बना दिया है.

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